स्वामी विवेकानंद जी का फलसफा : बड़ा संघर्ष, महान सफलता
January 11, 2020 • कीर्ति राणा

 

विश्व के शीर्षतम मैनेजमेंट गुरु युवा पीढ़ी को मोटीवेट करने के लिए समझाते हैं कि संघर्ष से घबराओ मत, 'जितना बड़ा संघर्ष होगा सफलता उतनी ही महान होगी।' युवा इस सूत्र वाक्य को जीवन की अनमोल उपलब्धि मानकर मंजिल पाने के लिए जुट जाते हैं। पता नहीं आज की युवा पीढ़ी को यह याद है कि नहीं कि 12 जनवरी को भारत में मनाये जाने वाला युवा दिवस स्वामी विवेकानंद का जन्मदिन भी है और उन्होंने ही ऐसे मूल मंत्र विश्व को दिये हैं। आज जब तेरा धर्म, मेरा धर्म के विवादों से पूरा विश्व ग्रसित है तो वे विवेकानंद ही थे, जिन्होंने 11 सितम्बर 1893 को शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में मौजूद श्रोताओं को ‘‘मेरे भाई-बहनों’वाले सम्बोधन के पहले वाक्य से ही सभी का दिल जीत लिया था। उन्होंने किसी धर्म का अनादर नहीं किया लेकिन यह कहा कि मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रुप में स्वीकारते हैं। 39 वर्ष की उम्र में संसार से विदा हो गये स्वामी विवेकानंद के विचार आज भी विश्व को दिशा दिखाने का काम कर रहे हैं। स्वामी विवेकानंद का अविभाजित मध्यप्रदेश में रायपुर से भी गहरा नाता रहा है। आज छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बालक नरेन्द्रनाथ अपने मातापिता के साथ करीब 2 साल तब रायपुर में रहे थे। इसी के साथ मध्यप्रदेश की सीमा से लगे राजस्थान के खेतड़ी गांव में उनका आना-जाना रहा यही नहीं तत्कालीन खेतड़ी महाराजा के प्रयासों से ही वे शिकागो सम्मेलन में भारत के प्रतिनिधि के रुप में गये थे।

कलकत्ता में एक समृद्ध बंगाली परिवार में नरेंद्रनाथ दत्त (विवेकानंद) जन्मे, विश्वनाथ दत्त और भुवनेश्वरी देवी के आठ बच्चों में से एक थे। मकर संक्रांति के अवसर पर उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को हुआ था। पिता विश्वनाथ समाज में काफी प्रभाव के साथ एक सफल वकील थे। नरेंद्रनाथ की मां भुवनेश्वरी एक मजबूत और ईश्वरीय मन के साथ संपन्न एक महिला थी, जिसने अपने बेटे पर काफी प्रभाव डाला था। एक युवा लड़के के रूप में, नरेंद्रनाथ बुद्धि के तेज थे, शरारती भी थे और संगीत में भी रूचि थी। उन्होंने अपनी पढ़ाई में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, पहले मेट्रोपॉलिटन संस्थान में, और बाद में कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज। से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने हिंदु धर्मग्रंथों भगवत गीता और उपनिषद के साथ डेविड ह्यूम, जोहान गॉटलीब फिच और हर्बर्ट स्पेंसर के पश्चिमी दर्शन, इतिहास और आध्यात्मिकता का अध्ययन भी किया।

‘’क्या आपने भगवान को देखा है?‘‘ प्रश्न का समाधान किया रामकृष्ण परमहंस ने

भगवान के लिए अपनी बौद्धिक योग्यता को पूरा करने के लिए नरेंद्रनाथ सभी धर्मों के प्रमुख आध्यात्मिक नेताओं से मिले, उन्होंने सभी से एक सवाल पूछा, ‘‘क्या आपने भगवान को देखा है?‘‘ इसका किसी ने संतोषप्रद जवाब नहीं दिया। उन्होंने दक्षिणावर्त काली मंदिर के श्री रामकृष्ण परमहंस से भी यही प्रश्न पूछा झिझक के बिना, श्री रामकृष्ण ने उत्तर दिया - हां, मेरे पास है। मैं भगवान को स्पष्ट रूप से देखता हूं, जैसा कि मैं आपको देखता हूं, केवल गहन अर्थों में। रामकृष्ण की सादगी और उनके उत्तर से वे आश्चर्य चकित हुए। रामकृष्ण ने धीरे-धीरे इस तर्कसंगत युवक को अपने धैर्य और प्रेम से साथ जीत लिया। उनकी अच्छी तरह से पढ़ी जाने वाले ज्ञान ने उसे भगवान के अस्तित्व पर सवाल और कुछ समय तक अज्ञेयवाद में विश्वास करने के लिए प्रेरित किया। फिर भी वह पूरी तरह से सर्वोच्च होने के अस्तित्व की अनदेखी नहीं कर सके। वह कुछ समय के लिए केशवचंद्र सेन के नेतृत्व में ब्रह्मो आंदोलन से जुड़े हुए थे। ब्रम्हो समाज ने मूर्ति पूजा, अंधविश्वास से ग्रस्त हिंदू धर्म के विपरीत एक भगवान को मान्यता दी। अपने मन के माध्यम से भगवान के अस्तित्व के बारे में दार्शनिक सवालों के मेजबान अनुत्तरित रहे। इस आध्यात्मिक संकट के दौरान, विवेकानंद ने पहली बार स्कॉटिश चर्च कॉलेज के प्रिंसिपल विलियम हस्ति से श्री रामकृष्ण के बारे में सुना था।

सन 1884 में, नरेन्द्रनाथ को अपने पिता की मृत्यु के कारण काफी वित्तीय संकट से जूझना पड़ा क्योंकि उन्हें अपनी मां और छोटे भाई-बहनों के देखरेख की चिंता थी। उन्होंने रामकृष्ण को अपने परिवार के वित्तीय कल्याण के लिए देवी से प्रार्थना करने के लिए कहा। रामकृष्ण के सुझाव पर वह खुद मंदिर में प्रार्थना करने के लिए गये। एक बार जब वह देवी के सामने थे तो वे धन मांगने की अपेक्षा विवेक (विवेक) और ‘वैराग्य‘ की कामना की। बस इसी क्षण से नरेंद्रनाथ को पूर्ण आध्यात्मिक जागृति हो गई और उन्होंने खुद का जीवन तपस्या के लिए समर्पित कर दिया।

रायपुर के बूढ़ा तालाब में ध्यान मुद्रा में है स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा : रायपुर 1877 ईसवीं को जब 14 साल का किशोर नरेन्द्र नाथ रायपुर आया, तब शायद ही यहां किसी को आभास रहा होगा कि यह नरेन्द्रनाथ भविष्य में स्वामी विवेकानंद के रूप में अपनी वैश्विक पहचान बनाएगा। नरेन्द्र अपने पिता विश्वनाथ दत्त सहित मां भुवनेश्वरी देवी, छोटे भाई महेन्द्र व बहन जोगेन्द्रबाला के साथ रायपुर में करीब दो साल रहे। यह कोलकाता के बाद नरेन्द्र (स्वामी विवेकानंद) का किसी एक स्थान पर व्यतीत किया हुआ सर्वाधिक समय था। असल में उनके पिता विश्वनाथ दत्त पेशे से वकील थे। काम के सिलसिले में ही वे रायपुर आए थे, यहां अधिक समय तक रुकने की वजह से उन्होंने परिवार को भी यहां बुला लिया। वे परिवार समेत रायपुर के बूढ़ापारा में रहे। बताते हैं नरेन्द्र एवं उनका परिवार नागपुर से बैलगाड़ी के जरिए रायपुर पहुंचे। वहीं, कुछ संकेतों में व किताबों में उनके जबलपुर से ही बैलगाड़ी द्वारा मण्डला, कवर्धा होकर रायपुर आने की बात कही जाती है।नरेन्द्रनाथ की यह रायपुर-यात्रा इसलिए भी विशेष महत्वपूर्ण हो जाती है कि इस यात्रा में ही उन्हें अपने जीवन में पहली भाव-समाधि का अनुभव हुआ था।

विश्वनाथ दत्त रायपुर में अपने मित्र रायबहादुर भूतनाथ डे के घर पर ठहरे थे। यहां कोतवाली चैक से कालीबाड़ी चैक की ओर जाने वाली सडक पर बाएं हाथ में डे भवन स्थित है। भवन में स्वामी विवेकानंद से जुड़ी चीजें तो अब नहीं हैं, लेकिन रायबहादुर भूतनाथ डे के पुत्र हरिनाथ डे के संदर्भ में जानकारी देने वाला स्टोन जरूर मौजूद है, जिसमें उनके ३६ भाषाओं के जानकार होने की बात का उल्लेख है। डे भवन से नजदीक ही बूढ़ा तालाब स्थित है। बताते हैं कि रायपुर में रहने के दौरान नरेन्द्र नाथ (स्वामी विवेकानंद) स्नान करने बूढ़ा तालाब ही जाया करते थे, इसलिए ही बूढ़ा तालाब को शासन ने विवेकानंद सरोवर नाम दिया। तालाब के बीच टापू पर स्वामी विवेकानंद की ध्यान मुद्रा में विशालकाय प्रतिमा भी स्थापित की गई है।

खेतड़ी में विदिशानंद से हुए स्वामी विवेकानंद : राजस्थान के शेखावाटी अंचल में स्थित खेतड़ी एक छोटी किन्तु सुविकसित रियासत थी, जहां के सभी राजा साहित्य एवं कला पारखी व संस्कृति के प्रति आस्थावान थे। खेतड़ी नरेश राजा अजीतसिंह एक धार्मिक व आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले शासक थे। राजा अजीतसिंह ने माऊन्ट आबू में एक नया महल खरीदा था जिसे उन्होंने खेतड़ी महल नाम दिया था। गर्मी में राजा उसी महल में ठहरे हुये थे उसी दौरान 4 जून 1891 को उनकी युवा संन्यासी विवेकानन्द से पहली बार मुलाकात हुई। इस मुलाकात से अजीतसिंह इतने प्रभावित हुए कि राजा ने उस युवा संन्यासी को अपना गुरु बना लिया तथा अपने साथ खेतड़ी चलने का आग्रह किया जिसे स्वामीजी ठुकरा नहीं सके। इस प्रकार स्वामी विवेकानन्द 7 अगस्त 1891 को प्रथम बार खेतड़ी आये। खेतड़ी में स्वामीजी 27 अक्टूबर 1891 तक रहे। यह स्वामी विवेकानन्द जी की प्रथम खेतड़ी यात्रा थी तथा किसी एक स्थान पर स्वामीजी का सबसे बड़ा ठहराव था।  

कहा तो यह भी जाता है कि स्वामीजी का सर्वजन विदित ‘स्वामी विवेकानन्द’ नाम भी राजा अजीतसिंह ने रखा था। इससे पूर्व स्वामीजी का अपना नाम विविदिषानन्द था। शिकागो जाने से पूर्व राजा अजीतसिंह ने स्वामीजी से कहा कि आपका नाम बड़ा कठिन है तथा टीकाकार की सहायता के बिना उसका अर्थ नहीं समझा जा सकता है तथा नाम का उच्चारण भी सही नहीं है। और अब तो विविदिषाकाल यानि जानने की इच्छा भी समाप्त हो चुकी है। उसी दिन राजा अजीतसिंह ने उनके सिर पर साफा बांधा व भगवा चोगा पहना कर नया वेश व नया नाम स्वामी विवेकानन्द प्रदान किया जिसे स्वामीजी ने जीवन पर्यन्त धारण किया। आज भी लोग उन्हें राजा अजीतसिंह द्वारा प्रदत्त स्वामी विवेकानन्द नाम से ही जानते हैं। शिकागो में हिन्दू धर्म की पताका फहराकर स्वामीजी विश्व भ्रमण करते हुए 1897 में जब भारत लौटे तो 17 दिसम्बर 1897 को खेतड़ी नरेश ने स्वामीजी के सम्मान में 12 मील दूर जाकर उनका स्वागत किया व भव्य गाजे-बाजे के साथ खेतड़ी लेकर आये। उस वक्त स्वामी जी को सम्मान स्वरूप खेतड़ी दरबार के सभी ओहदेदारों ने दो-दो सिक्के भेंट किये व खेतड़ी नरेश ने तीन हजार सिेक्के भेंट कर दरबार हाल में स्वामी जी का स्वागत किया। सर्वधर्म सम्मेलन से लौटने के बाद स्वामी विवेकानंद जब खेतड़ी आए तो राजा अजीतसिंह ने उनके स्वागत में चालीस मण (सोलह सौ किलो) देशी घी के दीपक पूरे खेतड़ी शहर में जलवाए थे। इससे भोपालगढ़, फतेहसिंह महल, जयनिवास महल के साथ पूरा शहर जगमगा उठा था। 20 दिसम्बर 1897 को खेतड़ी के पन्नालाल शाह तालाब पर प्रीतिभोज देकर स्वामी जी का भव्य स्वागत किया। शाही भोज में उस वक्त खेतड़ी ठिकाना के पांच हजार लोगों ने भाग लिया था। उसी समारोह में स्वामी विवेकानन्द जी ने खेतड़ी में सार्वजनिक रूप से भाषण दिया जिसे सुनने हजारों की संख्या में लोग उमड़ पड़े। उस भाषण को सुनने वालों में खेतड़ी नरेश अजीतसिंह के साथ काफी संख्या में विदेशी राजनयिक भी शामिल हुये। 21 दिसम्बर 1897 को स्वामीजी खेतड़ी से प्रस्थान कर गये, यह स्वामीजी का अन्तिम खेतड़ी प्रवास था। खेतड़ी चौराहे पर तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. भैरोंसिंह शेखावत ने 1996 में स्वामी विवेकानन्दजी की आदमकद प्रतिमा का अनावरण किया था। जिससे आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा मिलती रहेगी। 2013 के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान नरेन्द्र मोदी ने अपनी खेतड़ी यात्रा के दौरान वहां के रामकृष्ण मिशन में जाकर स्वामी जी को श्रद्धांजलि अर्पित की थी।

जीवन की दिशा को बदल सकते हैं स्वामी विवेकानंद के ये अनमोल विचार

(स्वामी विवेकानंद जन्म 12 जनवरी 1863, मृत्यु 4 जुलाई 1902)

  1. पढ़ने के लिए जरूरी है एकाग्रता, एकाग्रता के लिए जरूरी है ध्यान. ध्यान से ही हम इन्द्रियों पर संयम रखकर एकाग्रता प्राप्त कर सकते है।
  2. ज्ञान स्वयं में वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है।
  3. उठो और जागो और तब तक रुको नहीं जब तक कि तुम अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लेते.
  4. जब तक जीना, तब तक सीखना, अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है।
  5. पवित्रता, धैर्य और उद्यम- ये तीनों गुण मैं एक साथ चाहता हूं।
  6. लोग तुम्हारी स्तुति करें या निन्दा, लक्ष्य तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न हो, तुम्हारा देहांत आज हो या युग में, तुम न्यायपथ से कभी भ्रष्ट न हो।
  7. जिस समय जिस काम के लिए प्रतिज्ञा करो, ठीक उसी समय पर उसे करना ही चाहिये, नहीं तो लोगो का विश्वास उठ जाता है। ध्यान और ज्ञान का प्रतीक हैं भगवान शिव, सीखें आगे बढ़ने के सबक
  8. जब तक आप खुद पे विश्वास नहीं करते तब तक आप भागवान पे विश्वास नहीं कर सकते.
  9. एक समय में एक काम करो, और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमे डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ।
  10. जितना बड़ा संघर्ष होगा जीत उतनी ही शानदार होगी।      

(प्रस्‍तुति: मनुज फीचर सर्विस)