शब्द सत्ता की शताब्दी
February 3, 2020 • मनोज कुमार

 शब्द सत्ता की शताब्दी मनाते हुए हम हर्षित हैं लेकिन यह हर्ष क्षणिक है क्योंकि महात्मा गांधी जैसे कालजयी नायक के डेढ़ सौ वर्षों को हम चंद महीनों के उत्सव में बदल कर भूल जाते हैं, तब सत्ता को आहत करने वाली पत्रकारिता की जयकारा होती रहे, यह कल्पना से बाहर है। इन सबके बावजूद शब्द की सत्ता कभी खत्म नहीं होने वाली है और ना ही उसकी लालसा स्वयं के जयकारा करने में है। शब्द सत्ता तो दादा माखनलाल चतुर्वेदी की कविता का वह गान है जिसमें दादा लिखते हैं..चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं..चाह नहीं.. इसी तरह शब्द सत्ता के माध्यम से संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर शब्द सत्ता के माध्यम से समतामूलक समाज के लिए संघर्ष करते हैं।

शब्द सत्ता की महत्ता तो तब है कि उसके लिखे से देश, प्रदेश और समाज की परिस्थिति में परिवर्तन आएवह अपने लिए कुछ नहीं चाहता है। वह स्व के स्थान पर परहित में स्वयं की कामयाबी देखता है। इस परिप्रेक्ष्य में जब हम माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा सम्पादित पत्रिका 'कर्मवीर' का विवेचन करते हैं या फिर डॉ. अम्बेडकर द्वारा सम्पादित 'मूक नायक' का अध्ययन करते हैं तो पत्रकारिता का ध्येय स्पष्ट हो जाता है। स्वाधीनता भारत में 'कर्मवीर' ने लोक जागरण का आह्वान किया था तो डॉ. अम्बेडकर स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी 'मूक नायक' के माध्यम से समाज में व्याप्त असमानता के खिलाफ लड़ते रहे । यह संयोग है कि एक पखवाड़े के अंतराल में दो महनीय प्रकाशनों के सौ वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। इस बात को कहने में संकोच नहीं है कि स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात । कर्मवीर और मूकनायक जैसे प्रकाशन विस्मृत हो चले हैं। स्मरण नहीं आता कि स्वाधीन भारत में इन दोनों प्रकाशनों में प्रकाशित होने वाली किसी सामग्री से सत्ताधीश असहज हए हैं। क्योंकि इन प्रकाशनों में वह धार अब शेष नहीं है जिसकी पत्रकारिता से उम्मीद की पराधीन भारत में पंडित माखनलाल चतुर्वेदी के साथ अनेक देशप्रेमी पत्रकार रहे लेकिन यहां चर्चा कर्मवीर और मूक नायक की क्योंकि 2020 में इनके प्रकाशन के 100 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। कर्मवीर और मूक नायक की चर्चा करते समय हमें इस बात के लिए चिंता करना चाहिए कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि कर्मवीर, मूक कब हो गया? क्यों हमने उसे राष्ट्र की आवाज बनाने की कोशिश नहीं की। जितना और जहां तक मेरा अनुभव है

प्रकाशन सरकारों की जयकारा नहीं करती है। यदि ऐसा होता पीत पत्रकारिता से अर्थ वही था जिसे आज हम पेडन्यूज तो अंग्रेज शासकों को कर्मवीर के नाम पर पसीना नहीं छूटा कहते हैं। पीत पत्रकारिता से पेडन्यूज का यह सफर पत्रकारिता करता। फिर ऐसा क्या हुआ कि कर्मवीर से नई पीढ़ी का को नेपथ्य में ले जाकर मीडिया में रूपांतरित करने का काल परिचय ही नहीं है। मूक नायक के प्रभावों से आने वाली है। इस कालखंड में टेलीविजन का उद्भव होता है। साल 75 पीढ़ी अनजान है। यह बात भी सौफीसदी सच है कि स्वाधीनता में हम पत्रकारिता के जिस उत्तरदायित्वहीनता की चर्चा करते के बाद नव भारत के निर्माण की महती जिम्मेदारी पत्रकारिता हैं, वह 90 के दशक में ठसक के साथ व्यवहारित होता के कंधे पर थी और पत्रकारिता ने इस जवाबदारी को, पत्रकारिता दिखता है। उम्मीदें थी कि टेलीविजन की पत्रकारिता समाज के धर्म को बखूबी निभाया लेकिन जैसे जैसे स्वराज से सुराज को नया दिशा देगी लेकिन उम्मीदें धराशायी हो गई । कयास की तरफ हम चल पडे, पत्रकारिता की तेजहीन होने लगा। यह भी लगाया गया था कि टेलीविजन के आगमन से प्रकाशन खासतौर पर 1975 के आपातकाल के बाद तो जैसे पत्रकारिता बंद हो जाएंगे लेकिन हुआ उल्टा। करीब तीन दशक में ही इस या उस खेमे में बंट गया। पत्रकारिता की रीढ़ की हड्डी लोगों का टेलीविजन पत्रकारिता से मोहभंग हो गयाकमजोर होने लगी लेकिन पत्रकारिता कुनबे को इस बात से टेलीविजन पत्रकारिता पर कई किस्म के सवालिया निशान गौरव हो सकता है कि इस संक्रमणकाल में भी नईदुनिया, लगे। प्रकाशनों पर समाज का विश्वास और गहराया है। इंदौर जैसा प्रकाशन ने अपनी रीढ़ को वैसे ही मजबूत रखा। ऐसे समय में कर्मवीर और मक नायक का स्मरण यह पत्रकारिता के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। किया जाना बहत जरूरी हो जाता है। यह आवश्यक इसलिए 1975 के आपातकाल के बाद सबसे ज्यादा नुकसान भी है कि प्रकाशनों की भीड़ बढ़ती जा रही है लेकिन कटेंट पत्रकारिता का हआ। इसी दौर में प्रकाशनों की बाढ़ सी आ में वह मारक क्षमता नहीं है जो सत्ता की नींद में खलल डाल गई। अनेक राज्यों में कई नए प्रकाशनों का आरंभ हुआ तो सके। पाठक और समाज बहुत संजीदगी से प्रकाशनों को देख कई पुराने प्रकाशनों ने राज्य और जिला संस्करण आरंभ कर रहा है कि इस समय में हमारी जवाबदारी बढ़ चुकी है। एक उन्हें विस्तार दिया। इस विस्तार से प्रकाशन संस्थान और बात पर करार किया जा सकता है, समझौता हो सकता है कि समाज दोनों को लाभ हुआ। शासन और सत्ता तक आंचलिक आज के दौर में कर्मवीर और मूक नायक का प्रकाशन नहीं हो समस्याओं की सूचना पहंचने लगी और समस्याओं का निपटारा सकता है लेकिन इस बात पर सहमति बनाने की कोशिश की तेज गति से होने लगा। दूसरी तरफ महानगरों में होने वाली सत्ता के गीत गाएंगे, टेलीविजन की तरह प्रकाशनों को भी गतिविधियों एवं नवाचार से वंचित तबका अब जानकारी से असामायिक बना देगी। पेज-थ्री की पत्रकारिता करना हो तो परिपूर्ण था। प्रकाशनों के विस्तार का लाभ तो यह हआ इसे मीडिया कहना ही उचित है लेकिन गांधी-तिलक की लेकिन एक बड़ा नुकसान यह भी हुआ कि प्रशिक्षण के पत्रकारिता करना हो तो कर्मवीर बनना पड़ेगा।