हिंदी सिनेमा के 104 वर्ष और स्त्री का बदलता स्वरूप
October 22, 2019 • Jyoti Yogeshwar

-ज्योति,

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़

jyotiyogeshwar.256@gmail.com

          भारत एक बहुआबादी वाला देश है, जहाँ प्रत्येक की अस्मिता (जाति, धर्म, नस्ल, समुदाय, वंश, एवं भाषा)  अलग है | फिर भी एक 'सिनेमा' है जो लोगों को कही न कहीं एक दूसरे से जोड़ता है | चाहे   व्यक्ति किसी भी भाषा को बोलने वाला हो या अन्य किसी भाषा को न समझने वाला हो इसके बावजूद वह 'हिंदी सिनेमा' से गहरा रिश्ता रखता है अर्थात् वह 'हिंदी सिनेमा' से अछूता नहीं है | यही कारण है कि विश्व में भारत फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में अग्रीणय स्थान रखता है | आज महिला सशक्तिकरण वैश्विक स्तर का मुद्दा है जहाँ स्त्रियों के सशक्त होने के प्रयासों पर ज़ोर दिया जा रहा है | भारतीय स्त्री की बात करें तो उसकी पहचान और अस्तित्व को बल मिला है, इस परिवर्तन को भारतीय सिनेमा के 104 वर्ष की यात्रा में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है | इस संदर्भ में 'दयाशंकर' कहते हैं कि, “आजकल जैसे अस्मितावादी विमर्श, दलित विमर्श, स्त्री विमर्श आदि का बड़ा ज़ोर है | अब जरुरी हो गया है, कि इनकी नज़र से सिर्फ समाज की ही नहीं, बल्कि भारतीय और हिंदी सिनेमा की बात की जाए |''1

          भारत में सिनेमा का जन्म 1913 ई० में हुआ | जो अब तक अपने सफर के 104 वर्ष पूरा कर चुका है | इन 104 वर्षों में 'सिनेमा' में स्त्री के बदलते स्वरूप को हम देख सकते हैं जो भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति तथा स्त्रियों के प्रति समाज के नजरिये को दर्शाते हुये आधी आबादी के बदलाव को प्रदर्शित करता है | जिसका अध्ययन हम पांच पड़ावों में करेंगे-

 

प्रथम पड़ाव- ( मूक सिनेमा- 1913 ई० से 1930 ई० तक)

          भारतीय सिनेमा की यात्रा 1913 ई० में मूक फिल्मों द्वारा प्रारम्भ हुई जो मुख्य रूप से 1930 ई० तक चली | आरम्भिक फिल्मों में ध्वनि नहीं थी तो भाषा का कोई सवाल ही नहीं था इसलिये मूक फिल्मों को हिंदी सिनेमा न कहा जाये तो कोई हानि नहीं है | मूक फिल्मों के जन्मदाता 'धुंडिराज गोविंद फाल्के' अर्थात् 'दादा साहब फाल्के' हैं | 'दादा साहब फाल्के' ने 1913 ई० में पहली फ़िल्म 'राजा हरिश्चंद्र' बनाई जिसमें तारामती की भूमिका 'सालुंक' नमक पुरुष ने निभाई थी | क्योंकि जब तक सिनेमा में स्त्री का प्रवेश नहीं हुआ था | “फ़िल्म में फाल्के जी किसी महिला अभिनेत्री को नहीं ले पाये एक तो उस समय पारसी रंगमंचीय परम्पराओं के अनुरूप केवल पुरुष ही महिला वेशभूषा में महिला की भूमिका अदा करते थे और दूसरा, उस समय समाज में कुलीन परिवारों की युवतियों के रंगमंच पर अभिनय पर प्रतिबन्ध था |”2 लेकिन इसी वर्ष फाल्के जी की अगली फ़िल्म 'मोहिनी भस्मासुर' में पहली बार दो स्त्रिओं ने प्रवेश किया, जिसमें मोहिनी की भूमिका निभाने वाली पहली भारतीय अभिनेत्री 'कमलाबाई गोखले' थीं | 1919 ई० में आयी 'कालियामर्दन' फ़िल्म में कृष्णा के बचपन की भूमिका निभाने वाली 'मन्दाकिनी' (दादा साहब फाल्के की पुत्री) को हम प्रथम बाल अभिनेत्री कह सकते हैं |

          तत्पश्चात फ़िल्मों में स्त्री की उपस्थिति बढ़ती गयी | 1919 ई० में 'द्रोपदी वस्त्र प्रहारं' फ़िल्म में द्रोपदी को मुख्य भूमिका में रखा गया | अब तक की फ़िल्में पौराणिक आख्यायन पर आधारित थीं | स्त्री को पवित्रता के परदे में परोसना सुनियोजित रूप से पितृसत्तात्मक व्यवस्था का हथकंड़ा है | संभवतः इसी कारण स्त्री की भूमिका को महत्त्व मिला | इस प्रारम्भिक सिनेमा के सफर में भले ही स्त्रियाँ उच्च घरों से ताल्लुक रखती हों लेकिन फ़िल्मी परदे पर स्त्री की उपस्थिति स्वयं में साहसिक थी |

          पौराणिक आख्यान पर बनी फ़िल्म 'अहिल्या उद्धार' (1919) में पहली बार स्त्री दुविधा को उभारने की कोशिश की गयी | 'अहिल्या' सुन्दर और पवित्र (जैसा की हमेशा से पवित्र शब्द ही स्त्री चरित्र का परिचायक माना जाता रहा है) स्त्री है तथा पतिव्रत भी, देवताओं द्वारा उसे छला जाता है, लेकिन इसके लिए वह स्वयं दोषी है | इसी कारण पति के श्राप से पत्थर की शिला बन जाती है | यहाँ इस फ़िल्म में पौराणिक आख्यान को प्रस्तुत नहीं किया गया, बल्कि कहीं न कहीं स्त्री के दर्द को उजागर करने का प्रयास किया गया है | इस समय में सती प्रथा को रेखांकित करने वाली फ़िल्में 'सती पार्वती', 'सती तुलसीवृंद', 'सती दाक्षायनी', 'सती अंजनी', 'सती अनुसया', 'सती पद्मिनी', 'सती सावित्री' आदि रहीं |  जिसमें पति धर्म का पालन एवम् पति के प्रति समर्पण ही स्त्री की पहचान रही तथा पति की चिता पर सती हो जाना ही स्त्री की एक मात्र विशेषता ! इस विशेषता को सिर्फ पुरुष समाज ने ही नहीं स्त्री ने भी सहर्ष स्वीकार किया | इस संदर्भ में 'ललित जोशी' लिखतें हैं कि, “शुरूआती समय में नायिका की परिभाषा सती सावित्री की थी | यह छवि उसे मिथक कहानियों से मिली थी | बाद में कुछ फिल्में जैसें 'औरत से सावधान'(1929), 'औरत का बदला'(1930), 'एक आदर्श औरत' (1930) तथा 'सिनेमा गर्ल' (1930), में इसे बदलने की कोशिश की गयी लेकिन स्त्री को स्वछंद पात्र की तरह निरुपित करने वाली इन फ़िल्मों में नारी मुक्ति के स्वरों को ढूढना बेकार होगा |”3 इन आरम्भिक फ़िल्मों के शीर्षकों की भाषिक संरचना को समझने का प्रयास किया जाये तो आश्चर्य होगा की स्त्री की शुरुआत पवित्रता के खोल से शुरू होकर सती तक पहुंचती है और दूसरी ओर उसके प्रतिलोम 'औरत से साबधान' जैसे चेतावनी रूपक बिम्बों से स्त्री के नकारात्मक रूप का ही विस्तार है |

         देवदासी प्रथा (देवदासी अर्थात ईश्वर के साथ विवाह बंधन में बंधी हुई लड़की) जिसका साक्ष्य विष्णु पुराण एवं मत्स्य पुराण में भी मिलता है | यह प्रथा दक्षिण भारत में प्रचलित थी इस प्रथा पर आधारित फ़िल्म 'देवदासी'(1925) आयी जिसमें स्त्री की मार्मिक पीड़ा का वर्णन एक समस्या के रूप में किया गया तथा इसी संदर्भ में बनी फ़िल्म 'देवदास' (1928) में स्त्री के वेश्या रूप को प्रस्तुत किया गया | 

          अब तक का फ़िल्मी स्त्री सफर सती से प्रारम्भ होकर एक वेश्या समाज की स्त्री तक आता है | समय के साथ बदलते परिवेश में स्त्री की भूमिका भी बदली | नौकरी करना तथा पुरुष के कंधे से कन्धा मिलाकर चलना स्त्री का यह स्वरूप हमें 1926-1927 ई० के दौरान आयी फ़िल्में 'टाइपिस्ट गर्ल', 'टेलीफोन गर्ल', 'एज्यूकेटेड वाइफ' जैसी फ़िल्मों में देखने को मिलता है | फ़िल्मों के ये नये नाम स्त्री भूमिक का अंदाज़ा ही नहीं देते बल्कि स्त्री के प्रति समाज का बदलता हुआ नज़रिया भी पेश करते हैं |

          इस समय की प्रमुख अभिनेत्रियों में 'ज़ुबैदा', 'गौहरबानो', 'सुलोचना' एवं गायिका में 'सरस्वती देवी' का नाम लिया जा सकता है | इस पड़ाव की सबसे बड़ी उपलब्धि निर्देशक 'फ़ातिमा बेगम' को कह सकते हैं, जिन्होंने सात फीचर फ़िल्मों का निर्देशन किया | यह पहली भारतीय महिला निर्देशक रहीं, इनके बाद फ़िल्मी दुनिया में एक लम्बे अंतराल तक महिला निर्देशक का आगमन नहीं हुआ |

 

द्वितीय पड़ाव (सवाक फ़िल्म 1931 ई० से 1950 ई० तक )

 

          14 मार्च 1931 ई० में पहली बार आवाज़ सहित फ़िल्म 'आलम आरा' प्रेम कहानी के रूप में उभर कर आयी जिसमें 'ज़ुबैदा' ने अभिनेत्री का किरदार निभाया | इस फ़िल्म के बाद सवाक फ़िल्म का दौर चल पड़ा जो फ़िल्मों को और भी सुदृढ़ आयाम प्रदान करने वाले रूप में उभर कर सामने आया | 1932 ई० में 'देवकी बोस' के निर्देशन में 'सीता' मायथोलोजिकल फ़िल्म बनी जिसमें राम की तुलना में सीता के व्यक्तित्व को मजबूती के साथ बड़े सशक्त अंदाज में प्रस्तुत किया | 'गुण सुन्दरी' (1932) फ़िल्म की मुख्य भूमिका में 'गौहरबानो' रही | इस फ़िल्म का उद्देश्य स्त्री को एक ऐसे व्यक्तित्व के साथ प्रदर्शित करता है जहाँ एक लड़की संयुक्त परिवार को बचाने के लिए अनेक प्रतिघातों को सहती है और बेटों से बढ़कर साबित होती है | फ़िल्म का आगमन भी ऐसे समय में हुआ जब स्त्री का सती रूप अधिक प्रशंसनीय था | इसी बर्ष 'कॉलेज गर्ल' तथा 'इंदिरा एम० ए०' आयी जिसमें स्त्री शिक्षा पर ज़ोर दिया गया |

          1935 ई० में आयी फ़िल्म 'जवानी की हवा' में स्त्री प्रस्तावित विवाह से बचने के लिए घर का त्याग कर अपने प्रेमी के साथ चली जाती है तथा पुरानी मान्यताओं और परम्पराओं को तोड़ती हुई अपना जीवन व्यतीत करती है | यह भारतीय सिनेमा की पहली फ़िल्म है जिसमें नायिका प्रेम के लिए घर का त्याग करती है | इस वर्ष 'हंटर वाली' फ़िल्म से स्टंट फिल्मों का चलन शुरू होता है, इसके निर्देशक 'वाडिया मूवीटोन' एक अलग तरह की नायिका लेकर आये जो पुराणों से अलग, घरेलू एवं नौकरी पेशा संभ्रांत स्त्री के रूप में नहीं बल्कि साहसिक नायिका जो मेकअप एवं सुन्दर वस्त्रों से दूर, घोड़े पर सवार होकर ट्रेन के सामने स्टंट करना, हाथ में बंदूक एवं कोड़ा लेकर मजबूर लोगों पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ़ लड़ने वाली एक क्रान्ति के रूप में थी | यह अभिनय 'मेरी इवान्स' यानी 'नदिया' ने किया, जिसे काफी सराहना मिली | 'अमर ज्योति'(1936) बेनिस के अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में दिखाई गई पहली फ़िल्म थी जिसे स्त्री मुक्ति की प्रथम फ़िल्म कहा जा सकता है | स्त्री की दमित स्थिति को दुनिया के सामने प्रस्तुत किया गया, जिसमें स्त्री पत्नी रूप में  हुए अत्याचारों का विद्रोह के साथ बदला लेती है | फ़िल्म में स्त्री को देवी मानकर पूजने वाले रूप के साथ-साथ अन्याय के ख़िलाफ लड़ने वाले देवी काली रूप को प्रस्तुत कर सन्देश दिया कि स्त्री पूजनीय रूप में शांत एवं धैर्यशाली है तो उसका दूसरा रूप एक और भी है जो अन्याय के ख़िलाफ लड़ सकता है | इसी वर्ष 'बालयोगिनी' बनी जिसमें पत्नी अपनी अस्मिता के लिए पति से विरोध करती है |

          'दुनिया ना माने' (1937) बेमेल विवाह पर बनी फ़िल्म है | जिसकी नायिका चाचा द्वारा बड़े बिधुर से कराये गये विवाह को विवाह न मान विद्रोह करती है तथा आत्मनिर्भर बन ज़िन्दगी को जीना सीखती है यह भारतीय स्त्री द्वारा समझौता न करने वाली प्रथम सामाजिक फ़िल्म रही |

          अतः हम देख सकते हैं कि स्त्री की सामाजिक स्थिति में भले ही न के बराबर परिवर्तन आया हो लेकिन स्त्रियों की स्थिति को लेकर पुरुष प्रधान समाज ने सोचना अवश्य प्रारम्भ कर दिया था | इस युग में सती का आधुनिक रूप से महिमामंडन भी किया गया | 'सती परीक्षा', 'दुल्हन', 'पति परमेश्वर', 'चरणों की दासी', 'सुहाग सिंदूर' आदि फिल्में जिसमें स्त्री को पुराने रूप में ही गड़ने की प्रक्रिया का समर्थन किया गया |

          अभिनेत्री के रूप में 'दुर्गा खोटे', 'सुरैया',  'जद्दनबाई' तथा गायिका के रूप में 'नूरजहाँ', 'अमीरीबाई', 'पारुल घोष' ने प्रसिद्धि पायी |

                                                 

तृतीय पड़ाव- (सिनेमा का स्वर्ण युग 1940 ई० से 1960 ई० तक )

          सन 1940 से 1960 ई० तक का समय फिल्मों का स्वर्ण युग माना जाता है | इस युग में 'औरत' (1940) 'डायमण्ड क्वीन' (1940), 'राजनृतकी', (1940), 'चरणों की दासी', (1941), 'गुडिया' (1942), 'मैं अबला नहीं हूँ', 'मीरा' आदि फिल्में आयीं | 'दहेज़' (1950) फ़िल्म में सास तथा नन्द द्वारा दहेज़ के लिये प्रताड़ित बहू 'राधा' आत्मसमर्पण नहीं करती बल्कि घर छोड़ने से इंकार करती है, जिसे फ़िल्म की पहली विद्रोही बहू का ख़िताब प्राप्त है | स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश की सामाजिक स्थिति में काफी बदलाब आया लेकिन स्त्री दृष्टी से निराशा जनक ही रहा | 'मदर इंडिया' (1957) में 'राधा' (नर्गिस) पति के छोड़ जाने के पश्चात् अपने बच्चों का पालन पोषण अकेले करती है | साहूकार द्वारा शादी एवं बच्चों की जिम्मेदारी लेने के प्रस्ताव को ठुकरा देती है | छोटे बेटे का साहूकार एवं गाँव की बेटी के प्रति गलत व्यव्हार को अनदेखा न कर स्वयं अपने बेटे को गोली मार देती है | फ़िल्म में कहीं न कहीं स्वतंत्रता आन्दोलन की झलक तथा देश के लिए बलिदान होने के अंश को स्त्री भूमिका में दिखाया गया है, जिसमें साहसी स्त्री के साथ भारतीय पारम्परिक         पत्नी को ही महत्त्व मिला | यह फ़िल्म 'ऑस्कर अवार्ड्' के फोरेन फ़िल्म कैटेगरी में नोमिनेट होने वाली पहली भारतीय फ़िल्म थी |

          1959 ई० में 'सुब्रमण्यम' की 'त्यागभूमि' आयी जो वर्तमान समय के परिप्रेक्ष्य में साहसिक स्त्रीवादी फ़िल्म मानी जा सकती है | फ़िल्म में नायिका को धनाड्य पति द्वारा घर से निकाल दिया जाता है, नायिका पति से शरण नहीं माँगती बल्कि संघर्ष करते हुये आत्मनिर्भर बनती है | इस दौरान पति की आर्थिक स्थिति बिगड़ जाती है, वह माफी मांगते हुए पत्नी को अपनाना चाहता है | नायिका उसे माफ नहीं करती लेकिन भरण पोषण हेतु पैसा देना स्वीकार कर लेती है | इसी प्रकार 'अमर प्रेम' (1960) की नायिका मारपीट करने वाले पति को छोड़कर व्यावसायिक गायिका बन जाती है और दूसरी शादी कर लेती है | फ़िल्म स्त्री की दूसरी शादी करने तथा समाज का स्त्री के प्रति बदलते नजरिये को प्रदर्शित करती है | फ़िल्मों का स्वर्ण युग स्त्री दृष्टी से मायूसी पैदा करने वाला ही रहा, फिर भी 'वन्दनी', 'सुजाता', आदि फिल्में स्त्री की स्थिति को उभारने की कोशिश करती नज़र आयी |

          'मीना कुमारी', 'नर्गिस', 'मधुबाला', 'शकीला', 'गीता बाली', 'कामिनी कौशल', 'सुरैया', 'बैजयंतीमाला', आदि अभिनेत्री तथा 'शमशाद बेगम', 'आशा भोसले', 'गीता दत्त', 'लता मंगेशकर', 'जोहराबाई' आदि गायिका अपने स्वरों से अपनी पहचान बना चुकीं थीं |

 

चतुर्थ पड़ाव- (एक्सन युग 1960 ई० से 2000 तक)

          1960 ई० के बाद एक्सन फ़िल्मों का आगमन हुआ | इस दौर की नायिका गुडिया मात्र थी, पुरुष के प्रति समर्पित एवं निर्भर तथा पुरुष द्वारा अबला समझ सुरक्षा देना फ़िल्मों की प्रमुख विशेषता रही है | अब स्त्रीमूलक समस्याओं को ज्यादा संज़ीदा रूप में अभिनीत किया जाने लगा, फिर भी इन दशकों की फिल्में स्त्री छवि को कुछ खास सफलता नहीं दिला सकीं | जिनमें 'साहब बीबी गुलाम' (1962), 'सीता और गीता' (1978), 'गृह प्रवेश' (1978), 'एक बार फिर' (1979) आदि फ़िल्म शामिल हैं |

          आठवें दशक के शुरूआती दौर में 'बाज़ार', 'मासूम' एवं 'सुबह' आदि फ़िल्म चर्चा में रहीं | 'सुबह' (1981) में 'जब्बार पोल' एक ऐसी स्त्री की कहानी लेकर आये जो सुविधा संपन्न परिवार को छोड़ ज़िन्दगी को नया आयाम देने निकलती है | समाज सेवा सम्बन्धी प्रशिक्षण ले चुकी नायिका वकील पति एवं समाजसेवी सास की अनिच्छा के बावजूद अपनी इकलौती बेटी को पति के पास छोड़कर नारी सुधारग्रह में अधीक्षक की नौकरी करती है | जहाँ उसे एक अलग ही दुनिया देखने को मिलती है | नारी सुधार के नाम पर किस तरह स्वार्थी तत्त्व ग़रीब सताई औरतों का क्रूरता से शोषण करते हैं जिसके लिए नायिका संघर्ष करती है | उसे नौकरी छोड़ने पर मजबूर कर दिया जाता है, जब वह घर लौटती है तो उसका पति अन्य औरत से सम्बन्ध बना चुका है; बेटी भी अपनाना नहीं चाहती | पति समझौता करने के लिए कहता है कि वह दूसरी औरत से सम्बन्ध को स्वीकार ले, लेकिन नायिका को मंज़ूर नहीं होता | फिर से वह एक नई चुनौती के संषर्ष के लिए निकल पड़ती है | यह फ़िल्म स्त्री यात्रा में मील का पत्थर साबित हुई | यहाँ से सिनेमा में स्त्री की अलग यात्रा प्रारंभ हो जाती है | फ़िल्म 'अर्थ' (1982) की नायिका (पूजा) का पति उसे छोड़कर प्रेमिका के साथ रहने का निर्णय लेता है | प्रेमिका के इंकार से वह वापस पत्नी के पास लौटता है 'पूजा' पूछती है कि अगर मैं ऐसा करती तो तुम क्या मुझे स्वीकारते ? नहीं | नायिका पति को ठुकराकर नौकरानी की बेटी को गोद लेने का निर्णय लेती है | यह फ़िल्म स्त्री द्वारा स्वयं की अस्मिता के लिए लड़ी लड़ाई को सार्थक आयाम देती है |

          'मंडी' (1983) फ़िल्म में समाज के उस पक्ष का चित्रण किया गया है जहाँ हमारी परम्पराएँ पुरुष के शौक तथ स्त्री के चरित्र से पहचान कराती रहीं हैं | वह है वेश्यावृति जो प्राचीनकाल से प्रचलन में रहा है | महिला बाल विकास मंत्रालय 2007 की रिपोर्ट के अनुसार देश में लगभग तीस लाख से ज्यादा महिलाएं वेश्यावृति की गिरफ़्त में हैं | ये आँकड़े सी० बी० आई० की रिपोर्ट के अनुसार दोगुने हो जाते हैं | फ़िल्म वेश्यावृति को बढ़ावा देने में लिप्त समाज एवं राजनीति के अलग-अलग नज़रिए खोलती है तथा वेश्या जीवन की विडंबना का संवेदनशील चित्रण प्रस्तुत करती है | इस समय भारत में महिला संगठनों का गठन हुआ | 1974 ई० में हैदराबाद में पहला नारी संगठन 'सचेतन नारी संगठन' ( POW- progressi organization of women, पत्नी प्रताड़ना के मुद्दे पर आधारित ) खुला तथा 1975 ई० को यूनाइटेड नेशंस ने अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष घोषित किया | इसके बाद देश भर में 'पुरोगामी स्त्री संगठन' ( पुणे ), 'स्त्री मुक्ति संगठन' (मुम्बई) आदि संगठन खुले, जिनका प्रभाव 'परोम', 'मिर्चमसाला', 'दामिनी', 'क्या कहना' आदि फ़िल्मों पर पड़ा |

          'मिर्चमसाला' (1986) की सोनाबाई (स्मिता पाटिल) ठेकेदार द्वारा की जाने वाली छेड़कानी का विरोध करती है तथा अन्य स्त्रियों को संगठित करती है |  यह लड़ाई सामन्तवाद के ख़िलाफ एक महिला युद्ध का रूप ले लेती है | 'दामिनी' (1993) की 'सौदामिनी' मध्यवर्गीय परिवारों में नैतिकता के नाम पर डाले हुए परदे को हटाते हुए बलात्करी की पक्षधर बनी न्यायव्यवस्था के समक्ष प्रश्न उठती है कि आज भी हमारी न्यायव्यवस्था के सामने बलात्कार को बलात्कार साबित करने के लिए स्त्री चरित्र को और ज्यादा उछाला जाता है | 'गॉडमदर' (1999) की 'राम्भी' एक पत्नी, माँ, घरेलू स्त्री से लेकर राजनीतिक स्त्री के रूप में पहचान बनाती है | 'अस्तित्व' (2000) की 'अदिति' यौन नैतिकताओं पर समाज के दोगलेपन पर प्रहार करती है | “चरित्र और नैतिकता हमारे यहाँ वैसे भी दुनिया को किसी गैर क़ानूनी अमानवीय, निकृष्ठ और जघन्य कार्य से नहीं, लिंग प्रयोग से तय होते हैं | स्त्री व्यक्तित्व के तो बड़े से बड़े गुब्बारे को 'नैतिक स्खलन' की छोटी सी सुई से आप फोड़कर ध्वस्त किया जा सकता है | बड़ी से बड़ी साध्वी को आप चरित्र हीन कहिए और गोली मार दीजिए समाज आपकी मर्दानगी के साथ होगा |”4 जहाँ पुरुषों के लिए विवाहेत्तर सम्बन्ध उचित हैं वहीँ स्त्री के लिए नहीं ? यहाँ सवाल ये नहीं है कि स्त्री के विवाहेत्तर सम्बन्ध को जघन्य अपराध न माना जाये, प्रश्न उस दृष्टी का है जिसमें स्त्री के लिए सजा का विधान है लेकिन पुरुष के प्रति असंवेदनशीलता ! इसी असंवेदनशीलता का विरोध 'अस्तित्व' में प्रदार्शित किया गया है |

          1913 ई० में शुरू हुई यात्रा जब शताब्दी के अंत तक पहुँचती है तो एक बड़ा बदलाब स्पष्ट रूप से दिखाई देता है | जहाँ स्त्री देवताओं के पाप से पत्थर की शिला बनने के लिए मजबूर होती थी अब उस थोपी सार्थकता को नहीं स्वीकारती बल्कि बराबर के हक़ की बात करती है | इस समय की प्रमुख अभिनेत्रियों में 'मुमताज़', 'सयाराबानो', 'शर्मीला टेगौर', 'आशा पारेख', 'शबाना आज़मी' (पदम् श्री), 'श्री देवी' (पदम् श्री), 'ज़ीनत अमन', 'हेमा मालनी', माधुरी दीक्षित' (पद्म श्री), तथा गायिका के रूप में 'साधना सरगम', 'कविता कृष्णमूर्ति', 'अनुराधा', 'अलीशा' (अंतर्राष्ट्रीय संगीत महोत्सव एशिया 2004 में प्रथम स्थान प्राप्त), 'अलका', 'श्रेया घोषाल', 'सुनिधि चौहान' आदि संगीत जगत पर छाई रहीं |

          इस पड़ाव में निर्देशिकाओं का एक बड़े अन्तराल के बाद आगमन हुआ | जिसमें 'सावित्री', 'सई परांजये', 'अरुणा राजे', 'विजया मेहता', 'राधा भारद्वाज', 'विजया मूले' आदि रहीं, जिसे एक बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है |

 

पंचम पड़ाव- ( 21वीं सदी की फ़िल्में 2001 ई० से अब तक)

          21वीं सदी महिलाओं की सदी मानी गयी है | 2001 में 'राष्ट्रीय महिला उत्थान नीति' महिलाओं को राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक दृष्टी से मजबूत करने हेतु बनायीं गयी | अब स्त्री अपनी स्थिति को नियति मानकर स्वीकार करने वाले रूप का त्याग कर समाज में अपना स्थान प्राप्त करने के लिये आगे बढ़ने लगी थी | जिसे हम 21वीं सदी की आरम्भिक फ़िल्मों 'लज्जा', 'चांदनी बार', 'हाईवे', 'गुलाब गैंग', 'ढेड इश्किया', 'रिवाल्वर रानी', 'लक्ष्मी', 'मर्दानी', 'पार्चड', 'कैलेंडर गर्ल', 'लिपस्टिक अन्डर माय बुर्खा' आदि में देख सकते हैं |

          'लज्जा' (2001) फ़िल्म में वैदेही, मैथली, जानकी, रामदुलारी चार महिलाओं पर होने वाले दहेज़, घरेलू हिंसा' लैंगिक शोषण, भ्रूणहत्या जैसी समस्याओं से जूझते हुए अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते देखते हैं | 'चांदनी बार' (2003) में गाँव से मुंबई आयी बेसहारा लड़की की त्रासद जीवन को, 'सत्ता' फ़िल्म राजनैतिक क्षेत्र में धाकड़ स्त्री के स्वरूप को प्रस्तुत करती है | पहली बार 1899 ई० में 'मिर्जा हादी रुसवा' ने अपराध जगत के द्वारा लायी गई 'उमरावजान' के वेश्या जीवन की अमानवीय गरिमा तथा संघर्ष को प्रस्तुत किया है | 'लगा चुनरी में दाग'(2007) वेश्यावृति पर बनी फिल्मों में से एक श्रेष्ट फ़िल्म हैं | 21वीं सदी में हम महिलाओं को हर क्षेत्र में काम करते देख सकते है लेकिन आज भी हमारी मानसिकता लिंग भेद की नीति से नहीं उभर पाई है | स्त्री को अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग समस्याओं का सामना करना पड़ता है | 'फ़ैशन'(2008) में ग्लैमरस दुनिया की चकाचौंध तथा 'क्वीन'(2014) में भारतीय संस्कारों के विरोधाभासों की जटिलताओं का सुंदर अभिनय किया गया है | 'हाइवे'(2014) समाज में बढ़ रहे दिन-प्रतिदिन स्त्री शोषण की कहानी को नये तथा सच्चे रूप में प्रदर्शित करती है और सोचने पर मजबूर करती है कि स्त्री घर के बाहर ही नहीं घर के अंदर भी असुरक्षित है, चाहे वह समाज का कैसा भी वर्ग हो | फ़िल्म एक ऐसे सच को नंगा करती है जिसमें घर के लोगों के द्वारा अपनी ही बच्ची का बलात्कार किया जाता है और उसे छिपाने में घर के ही लोगों का हाथ होता है | स्त्री कहाँ सुरक्षित है ? अर्थात् कहीं नहीं | सुरक्षा का घेरे को हटाकर सम्मान की दृष्टि से स्त्री को आजादी मिलनी चाहिए | “पारंपरिक तौर पर एक राष्ट्र के तौर पर हमारा रुख़ औरत को देवी या पुरुष की संपत्ति के तौर पर देखने का रहा है, न कि उसके बराबर |”5

'पाचर्ड'(2015) फ़िल्म में बाल-विवाह, वेश्यावृति, विधवा समस्या, घरेलू हिंसा, वैवाहिक-बलात्कार जैसी समस्याओं को रेखांकित करती है | 'लाजो' की कहानी बताती है कि आज भी स्त्री के माँ न बनने पर वह अकेली ज़िम्मेदार है | फ़िल्म की सकारात्मकता स्त्री मुक्ति का प्रश्न है | जो अंत तक बना रहता है | ग्रामीण जीवन पर आधारित फ़िल्म 'पाचर्ड' अपने शीर्षक की सार्थकता को प्रदशित करता है | स्त्री जीवन कितना शुष्क और नीरस है पूरी ईमानदारी के साथ फ़िल्म प्रस्तुत करती है | 'गुलाब गैंग'(2014) स्त्री संगठन, 'लक्ष्मी'(2014) बाल-वेश्यावृति, 'मरदानी'(2014), 'रिवाल्वर रानी'(2014) जैसी फ़िल्में स्त्री अन्याय के ख़िलाफ़ हथियार बंद लड़ाई को सही ठहराती हैं | 'नीरजा'(2016) इसी श्रेणी की फ़िल्म है | 'पिंक'(2016) में समाज के दोहरे मापदंड की नीति के सरल तथा व्यवहारिक प्रश्नों को सुलझाने की कोशिश की गई है | साथ ही रूढ़िवादी सोच पर चोट है | 'लिपस्टिक अंडर माय बुर्खा'(2016) में आधुनिकता और परम्परा की लड़ाई के बीच उलझती स्त्रियों की दास्ताँ है | उम्र के अलग-अलग पड़ावों की चार स्त्रियाँ ('बुआ जी', 'शीरीन अस्लम', 'लीला', 'रेहाना आबीदि') एक छोटे से शहर में अपने सपनों को साकार करने के लिए परम्पराओं को चुनौती देती हैं |  आर्थिक रूप से मजबूत 'बुआ जी' एक सपने को साकार होने की ईच्छा में अपना सारा कुछ गवां देती हैं | 'रेहाना आबीदि' संगीत के सपने को (जिसे उसका परिवार, धर्म, संस्कार, इज़ाज़त नहीं देते) पूरा करने के लिए गलत संगत ( शराब, सिगरेट, चोरी) का सहारा लेती है | यहाँ दोनों के कुछ सपने हैं जिन्हें समाज स्त्री होने नाते पूरा करने की अनुमति नहीं देता | 'बुआ जी' की कहानी बताती है कि स्त्री का वैवाहिक जीवन चुनने का अधिकार आज भी ज़रूरी नहीं समझा जाता है | 'रेहाना आबीदि' की बुर्खे में जींस और लिपस्टिक की चाहत दर्शाती है कि आज भी वस्त्रों का चुनाव पुरुषों के लिए आधुनिकता के आधार पर और स्त्री के लिए परम्परा के आधार पर पुरुष द्वारा ही निर्धारित किया जाता है तथा बदलते दौर के साथ उन्हें शिक्षा तो दी जाती है लेकिन स्वप्न पूरे करने का समान अवसर नहीं | 'शीरीन अस्लम' सेल्स वर्कर की भूमिका में भारतीय स्त्रियों के वैवाहिक शोषण, स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं की ओर ध्यान खींचती है | 'लीला' और उसकी माँ दैनिक ज़रूरियात को तथा छोटे-छोटे सपनों को पूरा करने की चाहत में उस रास्ते पर आ जाती हैं जो समाज द्वारा तिस्कृत है | फ़िल्म का अंत मनोविज्ञान पर आधारित है जो लिंग भेदी दृष्टिकोण को छोड़ने के लिए बाध्य करता है | यही आज की आवश्यकता है और स्त्रियों का अधिकार भी | परम्परा और संस्कृति के नाम पर भेदभाव के नियम भटकाव के रास्ते खोलता है जो समाज के लिए खतरा है |

अतः हिंदी सिनेमा के इस सुनहरे सफ़र में स्त्री अस्मिता हाशिए से केंदोंमुख है | सारी जटिलताओं के साथ पुरुष प्रधान व्यवस्था कभी कठोर तो कभी कमज़ोर होती रही | मनोरंजन की भौंड़ी पहचान आइटम सांग की दरिद्रता से लेकर साहसिक तथा स्त्री पहचान के सफल अभिनय को 'हिंदी सिनेमा' ने प्रस्तुत किया है | सशक्तिकरण के इस दौर में 'हिंदी सिनेमा' ने भी स्त्री की पहचान में एक कड़ी और जोड़ी है |

 

शोध संदर्भ ग्रन्थ

1 'भारतीय सिनेमा का सफ़रनामा', (समाज साहित्य और सिनेमा, दयाशंकर) संपादक पुनीत बिसारिया,     राजनारायण शुक्ल, एटलांटिक पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूजर्स, 2013 पृ सं 77

2 आजकल, जुलाई, अंक, 2006 पृ सं 37

3 ललित जोशी, हॉउसफुल, पृ सं 59

4 'आदमी की निगाह में औरत', राजेन्द्र यादव, राजकमल प्रकाशन, चौथा संस्करण, 2015, नई दिल्ली, पृ सं 42-43

5 'सिनेमा की स्त्री और समाज का यथार्थ', शर्मीला टैगोर, समयांतर, जनवरी, 2014

सहायक फ़िल्म

  1. देवदासी (1925) निर्देशक मणिलाल जोशी
  2. सीता (1932) निर्देशक देवकी बोस
  3. जवानी की हवा (1935) निर्देशक फ्रांज आस्टेन
  4. दुनिया न माने (1937) निर्देशक बी शांताराम
  5. दहेज़ (1950) निर्देशक बी शांताराम
  6. मंडी (1983) निर्देशक श्याम बेनेगल
  7. लज्जा (2001) निर्देशक राजकुमार संतोषी
  8. हाइवे (2014) निर्देशक इम्तियाज अली
  9. पाचर्ड निर्देशक लीना यादव
  10. लिपस्टिक अंडर माय बुर्खा निर्देशक अलंकृता श्रीवास्तव
  11. मैरी कौम निर्देशक उमंग कुमार
  12. नीरजा निर्देशक राम माधवनी
  13. अकीरा निर्देशक ए आर मुर्गदास