आत्मनिर्भर बनने के मिले नए अवसर
May 5, 2020 • विनय त्रिपाठी

-विनय त्रिपाठी

     मध्यप्रदेश की वर्तमान सरकार ने महामारी जैसे संकटकाल में 23 मार्च 2020 को राजकाज सम्हाला था। संकट काल के रीति, नीति और नियम; सामान्य काल के रीति, नीति और नियम नहीं हुआ करते, इसलिए मुख्यमंत्री ने अकेले ही शपथ ली थी। कोविड-19 ने समूचे समाज के साथ-साथ सरकार के स्वभाव और चाल-चरित्र को भी बदला है। सामान्य दिनों में जहाँ भारी भरकम मंत्रिमण्डल हुआ करता था, वहीं प्रदेश में 28 दिनों तक एक सदस्यीय मंत्रिमण्डल ही रहा। यह भी आत्मनिर्भरता का एक रूप है। निश्चित ही यह चुनौतीपूर्ण और जोखिम भरा कार्य था, पर बड़े कामों के बड़े संकट तो होते ही हैं।

    अनुभव की दृष्टि से प्रदेश की वर्तमान सरकार अक्षय तृतीया के घट की भाँति कोरी नहीं है अपितु वह तो अच्छी तरह सीझे हुए घट के समान है। बहुत कम घट होते हैं जो सीझ पाते हैं। और सुधीजन जानते हैं कि सीझे घट का पानी ठण्डा नहीं होता, इसलिए उसमें पानी भरने की नादानी भी नहीं की जाती, उस में तो कीमती दृव्य सहेजे जाते हैं। प्रदेश में संकट काल में सीझे हुए नेतृत्व की ही आवश्यकता थी। महाकवि कालिदास ने लोक कल्याण करने वाले श्रेष्ठ शासक की भूमिका जन्मदाता पिता से बढ़कर बताई है। वे कहते हैं कि अच्छे शासक के राज्य में जन्मदाता पिता तो मात्र जन्म का हेतु होता है, पिता की वास्तविक भूमिका तो शासक ही निभाता है। ऐसा शासक अपने जन का भली प्रकार पालन-पोषण करते हुए उसे सदा आत्मनिर्भरता की राह दिखाता है।

    लोककल्याणकारी सरकार ने अपने जन के जन्म लेने के पहले से ही उसके कल्याण की योजना बनाई है। माँ- बच्चे को अपनी कुक्षि में धारण करती है और सरकार माँ सहित उसे अपनी गोद मे ले लेती है। वह गर्भवती के साथ उसके गर्भ में पलने वाली संतति का पूरा ध्यान रखती है। बच्चे के जन्म के समय की बेहतर सुविधाओं के साथ ही जच्चा-बच्चा के बेहतर पोषण के लिए सहायता राशि दी जाती है। आगे आंगनबाड़ियों में स्वास्थ्य परीक्षण और पोषाहार के साथ-साथ आरंभिक शिक्षा तथा खेलकूद की व्यवस्था की जाती है। विद्यालयों में मध्याह्न भोजन की व्यवस्था की गई है। और भी कितनी योजनाएँ हैं जिन के मूल में यही चाह काम करती है कि नौनिहालों और किशोरों, नव युवक-युवतियों के लालन-पालन, शिक्षा और उन के व्यक्तित्व के विकास में कोई कमी न रह जाए। कोविड काल में ऑनलाईन कक्षाओं की व्यवस्था की गई है।

    यह सब आत्मनिर्भर बनने की ओर के मजबूत पग हैं। इसलिए कि स्वस्थ और शिक्षित बच्चे ही आत्मनिर्भर नागरिक के रूप में विकसित हो सकते हैं।

आत्मनिर्भरता का सम्बन्ध मात्र शिक्षित से ही नहीं। इस का सम्बन्ध मुख्यरूप से आजीविका के लिए यत्नशील गृहस्थों से है। ये गृहस्थ शिक्षित-अशिक्षित सभी प्रकार के हैं। सरकार की अनेक योजनाएँ हैं जो प्रत्यक्षाप्रत्यक्ष रूप से इन सभी को आत्मनिर्भरता की राह दिखाती हैं। कई बार सरकारी योजनाओं की जनता तक भलीभाँति पहुँच सुनिश्चित नहीं हो पाती, पर इस में योजनाओं का दोष नहीं। कई बार हितग्राही सचेत नहीं होता, तो कई बार उस तक सूचना ही नहीं पहुँच पाती, इस सम्बन्ध में सावधानी बरतकर अधिक सार्थक परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। सरकार इस हेतु सदा यत्नशील भी रहती है। संचार के विविध साधनों का वह सम्यक और कुशलतापूर्वक उपयोग भी करती है।

    आत्मनिर्भर बनने के लिए सबसे अधिक आवश्यक होता है कि व्यक्ति साहसी हो। साहस का सम्बन्ध जोखिम उठा सकने की क्षमता से है। इच्छा और योग्यता होने के बावजूद गरीबी के कारण बहुत से लोग आर्थिक जोखिम उठाने की स्थिति में नहीं होते। सरकार ने ऐसे लोगों का सहायक बनने का प्रयास किया है। उन्हें जोखिम मुक्त बनाने का प्रयास किया है ताकि वे निश्चिंत हो कर अपना काम-धंधा आरंभ कर सकें।

     सब की आवश्यकताएँ भिन्न-भिन्न होती हैं। यह बात विभिन्न योजनाएँ बनाते समय ध्यान में रखी गई हैं  किसी की बिल्कुल छोटी सी चाह है सो उस के लिए स्वसहायता समूह हैं। सहकारिता की भावना से युक्त यह एक बहुत अच्छी योजना है जिससे अधिकांश लोग लाभान्वित हो सकते हैं। बहुत से लोग लाभान्वित हो भी रहे हैं। कुछ स्वसहायता समूह आदर्श रूप में काम कर रहे हैं। स्वसहायता समूह एक ऐसी युक्ति है जिससे विविध क्षेत्रों, विविध रुचियों, विविध व्यवसायों के लोगों के आत्मनिर्भर बनने की राह खुलती है। जंगल के बीच बनी प्रकृति मित्र आदिवासियों की घास-फूस की झोपड़ियों, ठेठ पठारी ग्रामों, मझोली बस्तियों, कस्बों, शहरों; सब के लिए सरकार के पास बेहतर वर्तमान और सुखद भविष्य के लिए योजनाएँ हैं। वह निरक्षर-साक्षर, शिक्षित-अशिक्षित, सभ्य-गँवार आदि सभी प्रकार के स्त्री-पुरुषों के हित चिंतन के प्रति प्रतिबद्ध है।

     राज्य का अस्तित्व भूमि, जन और सरकार के समुच्चय से पुष्ट होता है। भूमि प्रकृति है, जन भोक्ता है और सरकार नियामक। आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ती लोक कल्याणकारी सरकार प्रकृति के संरक्षण और जन के कल्याण के लिए सदा यत्नशील रहती है। यह सब कुशल नेतृत्व के बिना संभव नहीं।

सरकार का चरित्र उसके मुखिया के चरित्र में झलकता है। कहा गया है-
"मुखिया मुख सौ चाहिए, खानपान कौ एक।
पाले पोसे सकल अंग,
तुलसी सहित विवेक।।"

तात्पर्य यह कि सरकार के प्रमुख को जन-जन का पालन-पोषण विवेकसम्मत हो कर करना चाहिए। और विवेकसम्मत हो कर इस तरह पालन-पोषण करना चाहिए कि जनताजनार्दन आत्मनिर्भर हो सके। लोककल्याणकारी लोकतंत्रात्मक व्यवस्था में सरकार के सम्मुख यही एकमात्र पुष्ट पथ है। प्रदेश इस पथ पर बढ़े, यह स्वाभाविक है।

   आत्मनिर्भर होना अत्यन्त गौरव की बात है। आत्मनिर्भर कभी दीन-दुखी नहीं हो सकता। प्रदेश से दीनता और दुख दूर हों ऐसी सभी की कामना है। सब के हाथों को काम मिलने पर ही यह संभव हो सकता है। इस दिशा में प्रदेश आगे बढ़ रहा है। मनुष्य के विकास के सम्बन्ध में जब हम आत्मनिर्भरता की बात करते हैं तो एक समूचा बिम्ब उभरता है, एक समूची दृश्यावली आँखों के सामने चलचित्र की भाँति चलने लगती है। वस्तुतः आत्मनिर्भर हो जाना अर्थात् आजीविका के सम्बन्ध में एक तरह से अमृततत्व पा लेना है, लेकिन यह सब इतना सहज नहीं। आधुनिक विकास की जटिल प्रक्रिया के सम्बन्ध में आत्मनिर्भरता बिना सहयोग के नहीं आती। इसमें सब से बड़ी सहायक बनती है सरकार।

   लोकतंत्रात्मक लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा को व्यावहारिक रूप देती सरकार यथासंभव गरीब से गरीब व्यक्ति को सुखी देखना चाहती है। यही उस की रीति-नीति में झलकता है। राज्य के नीतिनिर्देशक तत्व सरकार के लिए मार्गदर्शक का काम करते हैं। वर्तमान समय में तो वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ की विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से भी मार्गदर्शन और सहायता मिलने लगी है।उपर्युक्त आधारभूमि में अपना प्रदेश मध्यप्रदेश विलक्षण है। यहाँ के लोगों की जीवटता उन्हें अन्य लोगों के बीच अलग पहचान देती है। हम मध्यप्रदेशवासी स्वभाव से ही अक्खड़ और फक्कड़ हैं। यह स्वभाव हमें आत्मनिर्भरता के लिए प्रेरित करता है। यह स्वभाव हमारे यहाँ की मिट्टी की थाती है। यह स्वभाव हमारे यहाँ के जल में छलकता है। यह स्वभाव हमारे यहाँ के पठारी झाड़-झंखाड़ी परस्थितियों में रचाबसा है। यह स्वभाव हमारे हर्र, बहेरा, आँवला में है, यह चरवे की गुठली और तेंदू के पत्ते में है, यही सागोन और साल के वनों में है, यही मेहनती मध्यम कद के गठीले तनों में है, यही रवि-ग्रीष्म और खरीफ की फसलों से मंडियाँ भर देने वाले कृषक मनों में है। यह स्वभाव यहाँ की वायु में समाया है। यह स्वभाव हमारे ताल-तलैयों में रचाबसा है। हमारी नदियाँ और पर्वत घाटियाँ हमारे इस सनातन स्वभाव का घोष करती हैं। वे मानो हमारे आत्मनिर्भर स्वभाव की शंख-झालर और विजयघण्ट हैं। प्रदेश की जीवन रेखा के रूप में समादृत माई नर्मदा ने अपनी राह बनाई है। छोटे-छोटे गाँवों में रचेबसे हम प्रदेशवासी जंगल में मंगल मनाने और नीम की छाँव तले पठार को बिछौना बनाने के अभ्यस्त हैं। हमने पाँव-पाँव अपने गाँव-गाँव और ठाँव-ठाँव को जाना है, समझा है। हम आत्मनिर्भरता की इबारत के अभ्यस्त जन हैं।

     इस सब के बाद भी बढ़ती जनसंख्या और आवश्यकताओं के दबाव के बीच आत्मनिर्भरता की राह समतल नहीं। वह निरापद भी नहीं। मिले नए अवसरों के बीच आत्मनिर्भर होना, आज यथार्थ भी है और एक स्वप्न भी। चुनौती है कि यथार्थ को आगे बढ़ाना है और स्वप्न को साकार करना है।आत्मनिर्भर 'आत्म' और 'निर्भर' दो शब्दों के योग से बना है। चाह यही है कि अंतस बुहार लें और बाहर संवार लें।यह एक ऐसा वैशिष्ट्य है जिस के व्यक्ति या व्यवस्था में आ जाने से समाधान स्वतः सम्मुख आते चले जाते हैं।